शाम से…।

शाम से कुछ अंदर से खा रहा है,
शाम से मन्न कुछ छटपटा रहा है।

हुआ यूं तो कुछ भी नहीं,
परंतु लगे भी कुछ न सही।

कदम आज आगे बढ़ पड़े हैं,
पर मुझ वृक्ष कि पुरानी जड़े हैं।

तन चल चुका है अब आगे की ओर,
मन जुड़ा रहा पुरी ऊन की धागे की डोर।

लौटते वक्त, दफतर से, याद आई पुरानी गलियों की,
जब वक्त था मासूम, बौछार फूलों की कलियों की।

बहुत दूर आज आ खड़े हैं हम,
शांती की चाह है बस अब। न ज़्यादा न कम।

ले चलो मुझे एक खटिया पे,
सोना है अब शांती में, ऐक तकिया पे।

तलब अभी भी उसकी बाकी है,
यादों का ज़ागिर हूँ, वही मेरे साथी है।

शाम से कुछ अंदर से सता रहा है,
शाम से यह दिल छटपटा रहा है।

हुआ यूं तो कुछ भी नहीं,
परंतु लगे भी कुछ न सही।

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So much more…

I was color blind,
But with her I saw clarity, so much more.

I lacked what they called laughter,
But our jokes cracked me up, so much more.

Life usually seems so waste,
But there is always more to it, so much more.

I realized so many dreams,
And still had dreams so many more.

Letters stopped coming. Seasons changed.
But I had ink bottle still half full. For I had to write so much more.